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ट्रंप का “शांति बोर्ड” फ़लस्तीनियों के ज़ख्मों पर नमक रगड़ने जैसा

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भारत-फ़लस्तीन एकजुटता नेटवर्क (आईपीएसएन) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फ़लस्तीन और ग़ाज़ा के लिए "बोर्ड ऑफ़ पीस" बनाने के उस प्रस्ताव की निंदा की है जिसमें पूरी बेशर्मी से ग़ाज़ा और फ़लस्तीन को धनकुबेरों के सामने नीलाम अथवा जिबह करने के लिए तश्तरी में परोस दिया गया लगता है। यह लाखों फ़लस्तीनियों के ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने और दुनिया के इंसाफ़पसंद लोगों को मुँह चिढ़ाने जैसा है। 

बयान में कहा गया है कि -  

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप ने हाल में “ग़ाज़ा और फिलिस्तीन के लिए बोर्ड ऑफ़ पीस” की घोषणा की है। उन्होंने स्वयं को इस बोर्ड का अध्यक्ष घोषित किया है और अपने दामाद जैरेड कुश्नर तथा इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मुख्य सदस्यों में शामिल किया है।  यह फ़लस्तीन के बच्चों और महिलाओं के खिलाफ युद्ध अपराधों को जायज ठहराने जैसा है और फ़लस्तीनियों की पीड़ा पर नमक छिड़कने के समान है।

बोर्ड ऑफ़ पीस बनाने की यह पहल, जिसे पुनर्निर्माण और प्रशासन की एक व्यवस्था के रूप में पेश किया गया है और जिसे पहले ही लागू माना जा रहा है, फ़लस्तीनियों की लम्बी चली आ रही मुश्किलों को और बिगाड़ सकती है। यह फ़लस्तीनी सभ्यता के ज़ख़्मों पर नमक छिड़कती है और असल में  ग़ाज़ा  को उन तंत्रों के ज़रिये इज़राइल के हवाले कर देती है जो स्थानीय स्वायत्तता और अधिकारों के बजाय बाहरी हितों को प्राथमिकता देते हैं।

ग़ाज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े और संयुक्त राष्ट्र के मानवतावादी मामलों के समन्वय कार्यालय (OCHA) तथा फ़लस्तीन के लिए बनाये गए संयुक्त राष्ट्र संघ की राहत कार्य एजेंसी (UNRWA) की रिपोर्टें युद्ध अपराधों का विस्तार दिखाती हैं। सात अक्टूबर 2023 से अब तक कम से कम 72,437 फ़लस्तीनियों की मृत्यु हो चुकी है और 171,324 घायल हुए हैं, तथा 19 लाख विस्थापित हुए हैं, जो ग़ाज़ा की कुल आबादी का लगभग 90% है।

ग़ाज़ा शहर अब बमबारी से पूरी तरह तबाह हो चुका है, वैसे ही खान यूनिस और रफ़ाह के कुछ हिस्से भी भारी प्रभावित हैं; आवासीय मकान, शैक्षिक संस्थान, मेडिकल केंद्र और अन्य ज़रूरी बुनियादी ढाँचे नष्ट या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हैं।

 

गाज़ा बोर्ड की संस्थापक कार्यकारी समिति में मिस्टर ट्रंप की सरकार के सदस्य, कॉर्पोरेट सहयोगी और ऐसे व्यक्ति शामिल हैं जिन्हें इज़राइल से निकटता या फ़लस्तीनियों के प्रति दुराग्रह और दुश्मन जैसी सोच के लिए जाना जाता है।

 

इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू, जो इस तबाही के मुख्य वास्तुकार माने जाते हैं, ने अपनी भागीदारी की पुष्टि की है। अन्य सदस्यों में अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो, ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, पूर्व यूके प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट के सीईओ मार्क रोवन, वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा, और ट्रंप के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट गैब्रियल शामिल हैं।

 

एक अन्य ग़ाज़ा कार्यकारी समिति में कुश्नर, विटकॉफ, ब्लेयर, रोवन, तुर्की के विदेश मंत्री हाकन फ़िदान, क़तर के राजनयिक अली अल-थवाडी, मिस्र के गुप्तचर विभाग के निदेशक हसन रशाद, संयुक्त अरब अमीरात के मंत्री रीम अल-हशीमी, इज़राइली व्यवसायी याकिर गबाय और नीदरलैंड के मध्य-पूर्व विशेषज्ञ सिग्रिड काग शामिल हैं।

 

इनका मक़सद स्पष्ट है। सबसे पहले, दामाद जैरेड कुश्नर ने 2024 के एक साक्षात्कार में ग़ाज़ा के तटीय इलाकों को विकास की संभावित जगह बताया और नागरिकों के अस्थायी स्थानांतरण का प्रस्ताव रखा था। स्टीव विटकॉफ और मार्क रोवन बड़े रियल एस्टेट और निवेश उद्यमों से जुड़े हैं। याकिर गबाय इज़राइली रियल एस्टेट और वित्त में कार्य करते हैं।

 

जो देश इस 'बोर्ड ऑफ़ पीस' में भागीदारी करना चाहते हैं, उन्हें कम से कम एक  बिलियन डॉलर (एक अरब डॉलर) का वचन देना होगा, पर यह फ़लस्तीनी अधिकारियों या फ़लस्तीनी नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को सीधे भागीदारी से बाहर रखता है। भले ही फ़लस्तीनियों को भाग लेने के लिए राज़ी कर भी लिया जाए, तो भी यह एक अरब डॉलर की माँग उन्हें उनके शासकीय और पुनर्निर्माण से जुड़े निर्णयों से पूरी तरह बहिष्कृत कर देती है।

 

पीस बोर्ड में प्रधानमंत्री नेतन्याहू को जानबूझकर शामिल किया जाना फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ राजनीतिक आक्रमण को जारी रखना है। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) ने नेतन्याहू पर नागरिकों को निशाना बनाने और मरते हुए लोगों को पहुँचाई जाने वाली मानवीय मदद रोकने जैसे युद्ध अपराधों के लिए गिरफ़्तारी वारंट जारी करने की प्रक्रिया चलाई है। दस्तावेज़ दिखाते हैं कि गाज़ा के 80% से अधिक आवास क्षतिग्रस्त या नष्ट हो चुके हैं।

 

बोर्ड ऑफ़ पीस बनाने की पहल चुनिंदा क्षेत्रीय सरकारों और इज़राइल के साथ सहयोग पर ज़ोर देती है, बजाय इसके कि ग़ाज़ा पर लगे प्रतिबन्ध हटाये जाएँ, वेस्ट बैंक में बसाहटों की गतिविधियाँ सुचारू हों, और अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार फ़लस्तीनियों के आत्म-निर्णय जैसे मौलिक मुद्दों को हल किया जाए।

 

ग़ाज़ा का पुनर्निर्माण फ़लस्तीनियों द्वारा तय और निर्देशित होना चाहिए, और अंतरराष्ट्रीय समर्थन ऐसे तरीक़े से दिया जाना चाहिए जो उनकी प्राथमिकताओं और कानूनी अधिकारों का सम्मान करे, जिनमें बहार चले गए फ़लस्तीनियों को वापस आने का अधिकार और आवश्यक सेवाओं की व्यवस्था भी शामिल हो। इन सब ज़रूर बातों पर यह बोर्ड ऑफ़ पीस बिलकुल भी खरा नहीं उतरता।

 

अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि ऐसी किसी भी पहल में स्थानीय समुदाय को प्रतिनिधित्व देना, उनकी भावनाओं और ज़रूरतों का समावेश करना ज़रूरी है। ऐसी किसी भी पहल में प्रभावित व्यक्तियों के लिए मुआवज़े  प्रावधान होना चाहिए। और इस सारी प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन के लिए कानूनी जवाबदेही तय होनी चाहिए।  अंतरराष्ट्रीय समुदाय में संयुक्त राष्ट्र संघ, यूरोपीय संघ और वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देश शामिल हैं। इनके मुताबिक़ पुनर्निर्माण पारदर्शिता, स्थानीय भागीदारी और फ़लस्तीनियों की भलाई को प्राथमिकता दे कर किया जाना चाहिए

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